जयपुर. मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बच्चों को शहर के
बड़े स्कूलों में पढ़ाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। प्रतिष्ठित
स्कूलों में एक बच्चे की फीस ही इतनी लग रही है, जितनी मध्यमवर्गीय परिवार
की सालाना कमाई होती है। पहली से आठवीं तक नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा की
सरकार की व्यवस्था के बीच निजी स्कूलों की मोटी फीस मध्यमवर्गीय परिवारों
को आर्थिक तंगी में झोंक रही है।
कहीं सातवें वेतनमान तो कहीं महंगाई सूचकांक को कारण बताकर इस साल भी
अधिकांश स्कूलों ने 40 फीसदी तक फीस बढ़ा दी। इसके खिलाफ कई स्कूलों में
अभिभावकों ने प्रदर्शन किए, शिक्षा विभाग में शिकायत भी दर्ज कराई। इस पर
कुछ स्कूलों की विभाग ने जांच कराई मगर मामला अभी लम्बित ही है।
फीस अधिनियम से भी नहीं लगी लगाम
निजी स्कूलों में
फीस बढ़ोतरी पर अंकुश के लिए राजस्थान विद्यालय (फीस का विनिमयन) अधिनियम
लागू किया गया। सरकार का दावा है कि फीस अब स्कूल स्तर पर समिति तय कर रही
है। जबकि हकीकत यह है कि हर साल फीस 20 से 40 फीसदी तक बढ़ रही है। कई
स्कूलों की सालाना फीस एक लाख पार कर चुकी है।
जितना बड़ा स्तर, उतनी फीस वृद्धि
राज्य में जो
निजी स्कूल जिस स्तर का है, उसी के मुताबिक फीस वृद्धि देखने को मिल रही
है। बड़े-प्रतिष्ठित स्कूलों में 35-40 और मध्यम स्तरीय
स्कूलों में 10-20 फीसदी बढ़ाई जा रही है।
सरकारी शिक्षक अधिक काबिल
जानकारों का कहना है कि
सरकारी स्कूलों में शिक्षक अपेक्षाकृत अधिक काबिल हैं। बीएड के बाद भर्ती
परीक्षा पास कर योग्य अभ्यर्थी का चयन ही शिक्षक के तौर पर किया जाता है।
जबकि ज्यादातर निजी स्कूलों में बीएड के बिना भी शिक्षक रखने की शिकायतें
आती रही हैं।
स्कूल और उनकी फीस
एसएमएस स्कूल —1,25,000 फीस
रेयॉन इंटनरनेशनल —1,00,000 फीस
भारती विद्याभवन विद्याश्रम —90,000 फीस
संस्कार स्कूल —70,000 फीस
माहेश्वरी स्कूल —80,000 फीस
सेंट जेवियर स्कूल —60,000 फीस
टैगोर इंटरनेशनल स्कूल —75,000 फीस
सोफिया स्कूल —62,000 फीस
दिल्ली पब्लिक स्कूल —70,000 फीस
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