बीससाल पहले पटवारी भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए तो पाली के रूपवास निवासी ललित सिंह ने भी आवेदन किया, उस समय उसकी उम्र मात्र 19 साल थी। ललित ने प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली और उसे नौ महीने की ट्रेनिंग पर भेज दिया गया। ट्रेनिंग भी सफलतापूर्वक पूरी हो गई और इसके बाद होने वाली परीक्षा में भी ललित सफल रहा और फील्ड में नियुक्ति के लिए कार्रवाई शुरू हो गई, लेकिन एक शिकायत ने ललित की नौकरी की हसरत पर पानी फेर दिया।
इसके बाद मुकदमेबाजी का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि अदालतों में बीस साल बीत गए। अब कहीं जाकर ललित को नौकरी मिली है, जबकि वह 40 साल का हो चुका है। ललित का मामला हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी और न्यायिक व्यवस्था में लेटलतीफी का और उससे आम व्यक्ति को होने वाले नुकसान का एक जीता जागता उदाहरण है। प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी इसलिए है, क्योंकि ललित के खिलाफ प्रतियोगी परीक्षा में चीटिंग का मुकदमा परीक्षा के कई साल बाद 2001 में दर्ज हुआ। वहीं न्यायिक व्यवस्था में यह मुकदमा लटका रहा और विभिन्न न्यायालयों में हुई सुनवाई में 13 साल पूरे हो गए।
1995में निकली थी पटवारी भर्ती की वैकेंसी
1995में राजस्व मंडल ने जिलावार भर्ती निकाली थी। इसके तहत उदयपुर के कलेक्टर ने भी आवेदन आमंत्रित किए थे। पाली के रूपवास निवासी ललित सिंह ने भी आवेदन किया और परीक्षा में शामिल हुआ। 9 सितंबर 1995 को लिखित परीक्षा आयोजित हुई, जिसमें ललित को सफल घोषित किया गया। अन्य सफल अभ्यर्थियाें की तरह ललित को भी नौ माह की ट्रेनिंग पर भेजा गया।
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद होने वाली परीक्षा में भी ललित शामिल हुआ, लेकिन उसका परिणाम घोषित नहीं किया गया और ही नियुक्ति दी गई। इस बाबत जब उसने पूछताछ की तो पता चला कि किसी ने उसकी शिकायत की है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि परीक्षा में खुद ललित नहीं बैठा। उसने अपनी जगह किसी और को परीक्षा दिलवाई। इस तरह उसने परीक्षा में चीटिंग की।
आखिर ली हाईकोर्ट की शरण
ललितने सभी ओर से निराश होने के बाद राजस्व मंडल और राज्य सरकार के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में रिट दायर कर दी। ललित ने नौकरी के अलावा समस्त परिलाभ दिलाए लाने की गुहार लगाई। 2008 में दायर हुई रिट पर 9 सितंबर 2013 को फैसला हुआ। जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास ने ललित की रिट मंजूर करते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्ता का फाइनल रिजल्ट घोषित किया जाए। इसके साथ ही अगर वह परीक्षा में सफल घोषित है तो नियमानुसार सभी परिलाभ सहित पटवारी पद पर नियुक्ति प्रदान की जाए। एकलपीठ के इस निर्णय को राजस्व मंडल राज्य सरकार ने खंडपीठ के समक्ष चुनौती दे दी। जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस पीके लोहरा की खंडपीठ ने एडमिशन के स्तर पर ही राज्य सरकार की स्पेशल अपील को नामंजूर कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि अपील में कोई सार नहीं है और ललित सिंह को पटवारी के पद पर सभी नोशनल परिलाभ प्रदान करते हुए नियुक्ति प्रदान की जाए।
खंडपीठके फैसले के बाद गुजर गया एक साल
खंडपीठने 25 अगस्त 2014 को राजस्व मंडल राज्य सरकार की स्पेशल अपील खारिज की थी, लेकिन इसके एक साल गुजरने आगे चुनौती नहीं दिए जाने के बावजूद ललित सिंह की फाइल राजस्व मंडल में एक से दूसरी सीट पर सरकती रही। आखिर अब जाकर उसे राहत मिली है। राजस्व मंडल अध्यक्ष ने उदयपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर ललित को पटवारी पद पर नियुक्ति देने और समस्त परिलाभ प्रदान करने के आदेश दिए हैं।
छह साल बाद दर्ज हुई एफआईआर
ललितसिंह के खिलाफ 1996 में शिकायत मिली थी कि उसने परीक्षा में चीटिंग की है और इसकी जांच शुरू हुई। जांच में पांच साल बीत गए और फोरेंसिक जांच के आधार पर यह पाया गया कि ललित की लिखावट परीक्षा की उत्तर पुस्तिका की लिखावट से नहीं मिलती है। फोरेंसिक जांच के आधार पर 2001 में उदयपुर के भूपालपुरा थाने में ललित के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक उत्प्रेरण का मुकदमा दर्ज हुआ। पुलिस ने चार्जशीट पेश कर दी। अदालत ने सुनवाई के बाद अपने निर्णय में कहा -
अत: जब तक अन्य तात्विक साक्ष्य के द्वारा प्रकरण के महत्वपूर्ण तथ्यों को अभियोजन पक्ष सिद्ध कर दे, तब तक केवल हस्तलेख विशेषज्ञ की साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती है। हस्तगत प्रकरण में अभियुक्त ललित सिंह के खिलाफ ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो उसे धारा 419/109 आईपीसी में किसी भी प्रकार से आलिप्त करती हो।
इस व्यवस्था के साथ न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या दो उदयपुर ने ललित सिंह को संदेह का लाभ देते हुए 13 जून, 2005 को बरी कर दिया।
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